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शान्ति पर्व
अध्याय १९७
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मनुरु उवाच
अवुद्धिरज्ञानकृता अवुद्ध्या दुष्यते मनः |  ४   क
दुष्टस्य मनसः पञ्च सम्प्रदुष्यन्ति मानसाः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति