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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
उच्छिष्टं भुञ्जते भर्तुः सा तु नित्यं युधिष्ठिर |  १२   क
दैवतं च पतिं मेने भर्तुश्चित्तानुसारिणी ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति