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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
न कर्मणा न मनसा नात्यश्नान्नापि चापिवत् |  १३   क
तं सर्वभावोपगता पतिशुश्रूषणे रता ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति