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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
देवतातिथिभृत्यानां श्वश्रूश्वशुरय़ोस्तथा |  १५   क
शुश्रूषणपरा नित्यं सततं संय़तेन्द्रिय़ा ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति