वन पर्व  अध्याय १९७

मार्कण्डेय़ उवाच

क्षन्तुमर्हसि मे विप्र भर्ता मे दैवतं महत् |  २०   क
स चापि क्षुधितः श्रान्तः प्राप्तः शुश्रूषितो मय़ा ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति