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वन पर्व
अध्याय १९७
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व्राह्मण उवाच
इन्द्रोऽप्येषां प्रणमते किं पुनर्मानुषा भुवि |  २२   क
अवलिप्ते न जानीषे वृद्धानां न श्रुतं त्वय़ा |  २२   ख
व्राह्मणा ह्यग्निसदृशा दहेय़ुः पृथिवीमपि ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति