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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वैतां निर्जितां सेनां रणे कर्णेन धीमता |  ३१   क
अभिय़ात्येष वीभत्सुः सूतपुत्रजिघांसय़ा ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति