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शान्ति पर्व
अध्याय ७४
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ऐल उवाच
न वै वातं परिवृनोति कश्चि; न्न जीमूतो वर्षति नैव दावः |  २०   क
तथाय़ुक्तो दृश्यते मानवेषु; कामद्वेषाद्वध्यते मुच्यते च ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति