वन पर्व  अध्याय १९७

स्त्र्यु उवाच

अस्मिंस्त्वतिक्रमे व्रह्मन्क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ |  २८   क
पतिशुश्रूषय़ा धर्मो यः स मे रोचते द्विज ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति