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वन पर्व
अध्याय १९७
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स्त्र्यु उवाच
यो वदेदिह सत्यानि गुरुं सन्तोषय़ेत च |  ३२   क
हिंसितश्च न हिंसेत तं देवा व्राह्मणं विदुः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति