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वन पर्व
अध्याय १९७
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स्त्र्यु उवाच
यस्य चात्मसमो लोको धर्मज्ञस्य मनस्विनः |  ३४   क
सर्वधर्मेषु च रतस्तं देवा व्राह्मणं विदुः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति