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वन पर्व
अध्याय १९७
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व्राह्मण उवाच
प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते गतः क्रोधश्च शोभने |  ४३   क
उपालम्भस्त्वय़ा ह्युक्तो मम निःश्रेय़सं परम् |  ४३   ख
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि साधय़िष्यामि शोभने ||  ४३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति