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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
अपध्याता च विप्रेण न्यपतद्वसुधातले |  ५   क
वलाकां पतितां दृष्ट्वा गतसत्त्वामचेतनाम् |  ५   ख
कारुण्यादभिसन्तप्तः पर्यशोचत तां द्विजः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति