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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
ग्रामे शुचीनि प्रचरन्कुलानि भरतर्षभ |  ७   क
प्रविष्टस्तत्कुलं यत्र पूर्वं चरितवांस्तु सः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति