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द्रोण पर्व
अध्याय ३६
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सञ्जय़ उवाच
स तु रणय़शसाभिपूज्यमानः; पितृसुरचारणसिद्धय़क्षसङ्घैः |  ३६   क
अवनितलगतैश्च भूतसङ्घै; रतिविवभौ हुतभुग्यथाज्यसिक्तः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति