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उद्योग पर्व
अध्याय १९७
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वैशम्पाय़न उवाच
ते शूराश्चित्रवर्माणस्तप्तकुण्डलधारिणः |  ४   क
आज्यावसिक्ता ज्वलिता धिष्ण्येष्विव हुताशनाः |  ४   ख
अशोभन्त महेष्वासा ग्रहाः प्रज्वलिता इव ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति