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शान्ति पर्व
अध्याय १९८
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मनुरु उवाच
धर्मादुत्कृष्यते श्रेय़स्तथाश्रेय़ोऽप्यधर्मतः |  १८   क
रागवान्प्रकृतिं ह्येति विरक्तो ज्ञानवान्भवेत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति