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वन पर्व
अध्याय १९८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अपश्यत्तत्र गत्वा तं सूनामध्ये व्यवस्थितम् |  १०   क
मार्गमाहिषमांसानि विक्रीणन्तं तपस्विनम् |  १०   ख
आकुलत्वात्तु क्रेतॄणामेकान्ते संस्थितो द्विजः ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति