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वन पर्व
अध्याय १९८
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मार्कण्डेय़ उवाच
स तु ज्ञात्वा द्विजं प्राप्तं सहसा सम्भ्रमोत्थितः |  ११   क
आजगाम यतो विप्रः स्थित एकान्त आसने ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति