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वन पर्व
अध्याय १९८
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रविश्य च गृहं रम्यमासनेनाभिपूजितः |  १७   क
पाद्यमाचमनीय़ं च प्रतिगृह्य द्विजोत्तमः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति