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वन पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
स शक्रवद्दानवदैत्यसङ्घा; न्विक्रम्य जित्वा च रणेऽरिसङ्घान् |  २१   क
विगाह्य तां पुष्करिणीं जितारिः; कामाय़ जग्राह ततोऽम्वुजानि ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति