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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
अहं सप्तर्षिपत्नीनां कृत्वा रूपाणि पावकम् |  ५२   क
कामय़िष्यामि कामार्तं तासां रूपेण मोहितम् |  ५२   ख
एवं कृते प्रीतिरस्य कामावाप्तिश्च मे भवेत् ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति