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भीष्म पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
मोहय़ित्वा कृपं द्रोणं द्रौणिं च स वृहद्वलम् |  १५   क
सैन्धवं च महेष्वासं व्यचरल्लघु सुष्ठु च ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति