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अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
वसुरेष महातेजाः शापदोषेण शोभने |  २८   क
मनुष्यतामनुप्राप्तो नैनं शोचितुमर्हसि ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति