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शान्ति पर्व
अध्याय ७४
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कश्यप उवाच
व्रह्मवृक्षो रक्ष्यमाणो मधु हेम च वर्षति |  १४   क
अरक्ष्यमाणः सततमश्रु पापं च वर्षति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति