वन पर्व  अध्याय १६७

अर्जुन उवाच

वध्यमानास्ततस्ते तु निवातकवचाः पुनः |  २४   क
शरवर्षैर्महद्भिर्मां समन्तात्पर्यवारय़न् ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति