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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अत्रापि विधिरुक्तश्च मुनिभिर्मांसभक्षणे |  ११   क
देवतानां पितॄणां च भुङ्क्ते दत्त्वा तु यः सदा |  ११   ख
यथाविधि यथाश्रद्धं न स दुष्यति भक्षणात् ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति