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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अमांसाशी भवत्येवमित्यपि श्रूय़ते श्रुतिः |  १२   क
भार्यां गच्छन्व्रह्मचारी ऋतौ भवति व्राह्मणः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति