वन पर्व  अध्याय १९९

मार्कण्डेय़ उवाच

स्वकर्म त्यजतो व्रह्मन्नधर्म इह दृश्यते |  १५   क
स्वकर्मनिरतो यस्तु स धर्म इति निश्चय़ः ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति