वन पर्व  अध्याय १९९

मार्कण्डेय़ उवाच

पूर्वं हि विहितं कर्म देहिनं न विमुञ्चति |  १६   क
धात्रा विधिरय़ं दृष्टो वहुधा कर्मनिर्णय़े ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति