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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
द्रष्टव्यं तु भवेत्प्राज्ञ क्रूरे कर्मणि वर्तता |  १७   क
कथं कर्म शुभं कुर्यां कथं मुच्ये पराभवात् |  १७   ख
कर्मणस्तस्य घोरस्य वहुधा निर्णय़ो भवेत् ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति