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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
जीवा हि वहवो व्रह्मन्वृक्षेषु च फलेषु च |  २२   क
उदके वहवश्चापि तत्र किं प्रतिभाति ते ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति