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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वं व्याप्तमिदं व्रह्मन्प्राणिभिः प्राणिजीवनैः |  २३   क
मत्स्या ग्रसन्ते मत्स्यांश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति