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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अहिंसेति यदुक्तं हि पुरुषैर्विस्मितैः पुरा |  २८   क
के न हिंसन्ति जीवन्वै लोकेऽस्मिन्द्विजसत्तम |  २८   ख
वहु सञ्चिन्त्य इह वै नास्ति कश्चिदहिंसकः ||  २८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति