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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
समृद्धैश्च न नन्दन्ति वान्धवा वान्धवैरपि |  ३२   क
गुरूंश्चैव विनिन्दन्ति मूढाः पण्डितमानिनः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति