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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
राज्ञो महानसे पूर्वं रन्तिदेवस्य वै द्विज |  ७   क
द्वे सहस्रे तु वध्येते पशूनामन्वहं तदा ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति