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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
यत्रास्य मन्युरुद्भूतो येन द्यूतमकारय़त् |  १०१   क
यत्र धर्मसुतं द्यूते शकुनिः कितवोऽजय़त् ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति