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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
कर्णस्य परिमोषोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरन्दरात् |  १२७   क
आरणेय़मुपाख्यानं यत्र धर्मोऽन्वशात्सुतम् |  १२७   ख
जग्मुर्लव्धवरा यत्र पाण्डवाः पश्चिमां दिशम् ||  १२७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति