वन पर्व  अध्याय १७८

सर्प उवाच

एवमेतद्भवेद्राजन्कार्यापेक्षमनन्तरम् |  ७   क
यदभिप्रेतमन्यत्ते व्रूहि यावद्व्रवीम्यहम् ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति