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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
हतेऽभिमन्यौ क्रुद्धेन यत्र पार्थेन संय़ुगे |  १६३   क
अक्षौहिणीः सप्त हत्वा हतो राजा जय़द्रथः |  १६३   ख
संशप्तकावशेषं च कृतं निःशेषमाहवे ||  १६३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति