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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
यत्र राजा महाप्राज्ञः सर्वधर्मभृतां वरः |  १९३   क
राज्ञां तानि शरीराणि दाहय़ामास शास्त्रतः ||  १९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति