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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
सत्यं सङ्क्षिप्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः |  ३८   क
स्थविरा वालमतय़ो वालाः स्थविरवुद्धय़ः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति