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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
यथावलं यथोत्साहं यथासत्त्वं महाद्युतिः |  ५८   क
मोहय़न्सर्वभूतानि द्रोणो हन्ति वलानि नः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति