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भीष्म पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
आर्श्यशृङ्गिस्ततो दृष्ट्वा समरे शत्रुमूर्जितम् |  ६४   क
कृत्वा घोरं महद्रूपं ग्रहीतुमुपचक्रमे |  ६४   ख
सङ्ग्रामशिरसो मध्ये सर्वेषां तत्र पश्यताम् ||  ६४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति