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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
व्यवहारोऽत्र कार्त्स्न्येन धर्मार्थीय़ो निदर्शितः |  २०२   क
विविधानां च दानानां फलय़ोगाः पृथग्विधाः ||  २०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति