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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
उवाच चैनं कालज्ञः स्मय़न्निव स नारदः |  ४७   क
व्रह्मर्षे कथ्यतां यत्ते पाण्डवेषु विवक्षितम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति