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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
यत्रार्जुनो द्वारवतीमेत्य वृष्णिविनाकृताम् |  २२३   क
दृष्ट्वा विषादमगमत्परां चार्तिं नरर्षभः ||  २२३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति