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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नो व्यासवाक्यप्रचोदितः |  २२८   क
धर्मराजं समासाद्य संन्यासं समरोचय़ेत् ||  २२८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति