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द्रोण पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
रश्मिजालैरिवार्कस्य विततैर्भरतर्षभ |  ५   क
कर्णचापच्युतैर्वाणैः प्राच्छाद्यत वृकोदरः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति