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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
विविधाः सम्भवा राज्ञामुक्ताः सम्भवपर्वणि |  ७५   क
अन्येषां चैव विप्राणामृषेर्द्वैपाय़नस्य च ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति