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द्रोण पर्व
अध्याय १५२
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सञ्जय़ उवाच
तौ विक्षरन्तौ रुधिरं समासाद्येतरेतरम् |  ४६   क
मत्ताविव महानागावकृष्येतां पुनः पुनः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति